Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookदुनिया में यह एक आम बात हो गई है कि औरत की जिंदगी मुसीबतें उठाने के लिए ही होती है। औरत के आँचल में दुख और आँखों में आँसू का होना भी ज़रूरी है। इसी तरह औरतें हमेशा बर्दाश्त से ज़्यादा मुसीबतें उठाती रही हैं, लेकिन कभी-कभी तकलीफ की हद से ज़्यादा होने पर औरत के नाज़ुक दिल में एक आग सी लग जाती है, और जब वह अपना रास्ता चुनती है, तो औरत से तूफ़ान बन जाती है। एक चट्टान से दीवार हो जाती है, इसके प्यार से दुनिया में बिजली सी चमक उठती है।
अलका भी एक ऐसी ही औरत है। इसकी जिंदगी मर्दों को खुश करने और आराम पहुँचाने में ही बीती जा रही है। शहर के दो दौलतमंदों ने अलका की जिंदगी के मुकाबले में खड़े होकर व्यापार करने लगे। एक ने अपने नुकसान को पूरा करने के लिए दूसरे से सवाल किया, दूसरे ने अपना खानदान नीचा होने पर भी दौलत की ताकत पर अपनी बेटी अलका के लिए उस बड़े घर में जगह बना ली और अलका मोहन बाबू की पत्नी बन गई। लेकिन मोहन बाबू के दिल की रानी या घर की लक्ष्मी न बन सकी। क्योंकि मोहन बाबू विलायत में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इसी दौरान में एक लड़की की मोहब्बत में गिरफ़्तार हो गए। और उस लड़की के कहने पर मोहन बाबू एक कंपनी में काम भी करने लगे। कंपनी जब हिंदुस्तान आई, तो उसके साथ मोहन बाबू और वह खूबसूरत लड़की भी आ गए।
फिर वही हुआ जो दुनिया में होता रहा है। वह विदेशी लड़की मोहन बाबू को अपने वश में कर लेती है। मोहन बाबू ने घर छोड़ दिया और अलका से भी दूर हो गए। नसीब के ज़ोर से मोहन बाबू और अलका एक ही होटल में रहने लगते हैं। पत्नी के रूप में जिस औरत को देखने की भी तमन्ना मोहन बाबू न रखते थे, उसी लड़की को एक अनजान लड़की समझकर मोहब्बत करने लगते हैं।
शौहर को हासिल करने का और अपनी जिंदगी में खुशी लाने का मौका अलका को मिल गया... और फिर...
और फिर एक औरत मर्द के दिल पर किस तरह काबू पाती है, यह सब आप सुनहरे पर्दे पर देखें।
[Translated from the official press booklet in Urdu]