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गुजराती सिनेमा : उम्र 60 वर्ष, तासीर, तस्वीर और तारीख

27 Mar, 2020 | Archival Reproductions by Dr Yasin Dulal
Gohar. Image Courtesy: Bharatiya Film Varshiki '92

मैंने जब पहली गुजराती फिल्म देखी तब मेरी उम्र 4-5 वर्ष रही होगी. उपलेटा के सेन्ट्रल सिनेमा में उन दिनों गुजराती फिल्म कभी कभार ही आती थी और एक फिल्म तीन – चार दिनों से ज्यादा नहीं चलती थी. पुरे सप्ताह तो कुछ खुशकिश्मत फिल्म ही चल पाती थी. फिल्म का प्रचार करने करने के लिए हाथगाड़ी पर दोनो तरफ बोर्ड लगाकर, ढोल-ढमाके के साथ पूरे गांव में घुमाए जाते थे. फिल्म के परचे बांटने का काम विनय नाम का एक लड़का करता था. “वेवीशारू” (सगाई) फिल्म के परचे गुलाबी रंग के थे वह मुझे अभी भी याद है. उन्है पढ़ कर ही मैं फिल्म देखने गया था. यह ज़माना 1948, 49 तथा 50 का था.  इन दिनों हिंदी फिल्मों के साथ साथ गुजराती फिल्मों की भी काफी धूम थी. उन दिनों में गुजराती की ‘गुण सुंदरी’, ‘गाड़ा नो बेल’, ‘वे विशाल’, ‘ननद भोजाई’, ‘रा’, ‘नवघण’, ‘वारसदार’, ‘मंगलफेरा’, ‘गोरख धंधा’, ‘दीवा दांडी’, ‘गोरा कुम्हार’, ‘मारे ते गामड़े एक बाद आवजो’ तथा ‘तमे थोड़ा वरणागी’ के गीत घर घर गूंज रहे थे. गीता दत्त के आवाज में गुजराती गीत बिल्कुल गुजराती लगते थे. मनहर देसाई और निरूपारॉय की जोड़ी दिलीप कुमार कामिनी कौशल जैसी ही मशहुर थी. बाबू राजे और छगन रोमियो की कॉमेडी देख कर हम हंसते हंसते पेट पकड़ लेते थे. ‘दिवा दांडी’ के गीत ‘तारी आंख नो अफीणी’ सुन कर नशा सा छा जाता था. आशा भोंसले तथा लता मंगेशकर भी गुजराती गीत हिंदी जैसी ही मिठास और अधिकार के साथ गाती थी. आज की तरह उच्च तथा मध्यम वर्ग गुजराती फिल्मों से तब विमुख नहीं था.

मनहर देसाई और निरूपारॉय की जोड़ी दिलीप कुमार कामिनी कौशल जैसी ही मशहुर थी. बाबू राजे और छगन रोमियो की कॉमेडी देख कर हम हंसते हंसते पेट पकड़ लेते थे.
मेरे बचपन का समय आज़ादी के बाद का समय था जब तक बात उत्कृष्ट होती थी. हिंदी और गुजराती दोनों भाषाओं में बढ़िया फिल्में बनती थीं. ‘मंगलफेरा’ और ’करियावर’ जैसी फिल्में लगभग हर गुजराती घर के सम्यों ने देखी होगी. राख न रमकड़ा मारा रामे रमता राख्या जैसे मे गुजरात की सामाजिक अस्मिता व्यक्त होती थी. लेकिन इसके बाद कोई गुजराती फिल्म देखने का मौका ठेठ 1960 मे ‘मेंदी रंग लाग्यो’ के साथ मिला. इस फिल्म के द्वारा विपिन गज्जर ने गुजराती फिल्मों में फिर चमक पैदा कर दी थी. ‘हू हरती फरती रस्ते रझकती वार्ता’ जैसे गीतों के साथ उसका संगीत भी लोकप्रिय हुआ. लेकिन विपिन की अगली फिल्म सत्यवान सावित्रि असफल रही. सन् 1964 में मनहर रसकफरे ने अखंड सौभाग्यवती में नए रंग भरे और कल्याणजी-आनंदजी ने उसमें मुकेश से बहुत ही मधुर गीत गवाए.

कई गुजराती फिल्मों की सूची बड़ी मज़ेदार, विचित्र और रसप्रद है. ‘मोजि लूं मुंबई’ तथा ‘मारी धणियाणि’ के नायक का नाम है अमभालाल. गुजराती फिल्मों के पितामाह द्वारकादास संपत की दो फिल्मों के नाम थे ‘अक्कल ना बरदान’ और 'घर जमाई’, और होमी मास्टर द्वारा बनाई गई कई फिल्में में से नाम की दृश्टि से विशिष्ट थी.

1949 में व्ही.एम. व्यास ने जहां ‘गुणियाल गुजरातण’ बनाई वहीं 1958 में उन्होंने ही ‘भारत नी वाणी’ भी बनाई. इसके आलावा  ‘होभल पक्षणी’, ‘सदेवंत सावकिंगा’, ’कुंवर बाई नु मोमेरो’, ’जेसल वोरल’, ’कादु मकराणी’, ‘शेणी विजानंद’, ‘राजा भृतहरि’, ’राजा हरिशचंद’, ’भक्त नरसैयों’ की कहानिया और फिल्में सुपरिचित है. इनमें से कई कहानियां बारंबार परदे पर आई हैं.
गुजराती फिल्में प्रारंभ में हिंदी सिनेमा के समांतर ही चलती रही. बंबई के फिल्म उद्दोग में कई अग्रणी निर्माता-निर्देशक गुजराती थे. चिमनलाल देसाई, मोहनलाल दवे, विजय भट्ट, चंदुलाल शाह तथा मेहबूब वगैरह सब गुजराती ही थे. इसके अलावा अर्देशिर ईरानी भी गुजराती ही थे. उनके द्वारा 1931 में पहली सवाक् फिल्म ‘आलम आरा’' के बनाए जाने के अगले वर्ष ही गुजराती ‘नरसिंह मेहता’ भी रिलीज हुई और लगभग हिंदी सिनेमा के साथ ही गुजराती सिनेमा की भी नींव पड़ गई. लकिन इसके बाद गुजराती फिल्में हिंदी के साथ तालबद्ध होकर नहीं बढ़ सकी.
गुजराती फिल्में प्रारंभ में हिंदी सिनेमा के समांतर ही चलती रही. बंबई के फिल्म उद्दोग में कई अग्रणी निर्माता-निर्देशक गुजराती थे. चिमनलाल देसाई, मोहनलाल दवे, विजय भट्ट, चंदुलाल शाह तथा मेहबूब वगैरह सब गुजराती ही थे. इसके अलावा अर्देशिर ईरानी भी गुजराती ही थे. उनके द्वारा 1931 में पहली सवाक् फिल्म ‘आलम आरा’' के बनाए जाने के अगले वर्ष ही गुजराती ‘नरसिंह मेहता’ भी रिलीज हुई और लगभग हिंदी सिनेमा के साथ ही गुजराती सिनेमा की भी नींव पड़ गई. लकिन इसके बाद गुजराती फिल्में हिंदी के साथ तालबद्ध होकर नहीं बढ़ सकी. वे पैर घिसट कर आगे बढ़ने की कोशिश करती रहीं और ज़मी दोज़ हो सके उससे पहले ही राज्य सरकार की कर मुक्ति का सहारा उसे मिल गया. लेकिन कर मुक्ति लके बावजूद गुजराती फिल्मों से अंधविश्वास, बेतुकी लोक कथाओं तथा स्तरहीन परिकथाओं की बु आती रही. वास्तविक जीवन की खुशबु इनसे कभी कभार ही आती थी. अभी हाल ही में परवेज मेरवान की पारसी फिल्म देखकर मन में सवाल उठा कि गुजराती में ऐसी बढ़िया कलात्मक और वास्तविक फिल्में ज्यादा क्यों नहीं बन पाती. एक आध वर्ष पहले दूरदर्शन पर गुजराती फिल्म कलापी प्रसारित हुई जिसमे गुजरात के प्रख्यात कवि जीवनी पर आधारित फिल्म में संजीव कुमार जैसे सफल अभिनेता के होते हुए भी कमजोर पटकथा और निर्देशन के कारण फिल्म कोई खास प्रभावित नहीं कर पाई. अच्छे संगीत के लिए कलापी की बढ़िया तैयार गज़लें भी बेकार हो गई. ईश्वर पेटलीकर की कृति पर सूरत के फीरोज सरकार ने जन्मपीट बनाई थी. ये सभी प्रयोग उल्लेखनीय हैं लेकिन गुजराती फिल्मों में ऐसे प्रयोग प्रत्येक 10-15 वर्षों के बाद ही हुए हैं.
हिंदी की तरह गुजराती फिल्मों का भी स्वतंत्रता के तत्काल का समय बहुत अच्छा रहा. लेकिन जहां सन् 1948 में 26 गुजराती फिल्में बनी वहीं 1949 में ये आंकड़ा घट कर 17 रह गया. इसके बाद के वर्ष में 13 तथा 1951 में मात्र 6 फिल्में बनी. सन 1952 में यह और ज्यादा घट कर 2 पर आया तथा 1953-54 में तो गुजराती फिल्मों का निर्माण बंद ही हो गया. इसके बाद 1955 और 1956 में 3-3 फिल्म आई, 1957 में शून्य तथा 1958 में एक फिल्म बनी.
हिंदी की तरह गुजराती फिल्मों का भी स्वतंत्रता के तत्काल का समय बहुत अच्छा रहा. लेकिन जहां सन् 1948 में 26 गुजराती फिल्में बनी वहीं 1949 में ये आंकड़ा घट कर 17 रह गया. इसके बाद के वर्ष में 13 तथा 1951 में मात्र 6 फिल्में बनी. सन 1952 में यह और ज्यादा घट कर 2 पर आया तथा 1953-54 में तो गुजराती फिल्मों का निर्माण बंद ही हो गया. इसके बाद 1955 और 1956 में 3-3 फिल्म आई, 1957 में शून्य तथा 1958 में एक फिल्म बनी. सन् 1960 में 2 फिल्म आई और दोनों ही उल्लेखनीय थी. पहली थी ‘कांदू मकराणी’ तथा दूसरी थी ‘मेंदी रंग लाग्यो’.  इन फिल्मों की निर्देशक थे मनहर रसकपुरे जो मंदी के इस दौर में भी एक दो फिल्में बनाकर गुजराती सिनेमा में प्राण वायु का संचार करते रहे. ऐसा एक उल्लेखनीय वर्ष था 1969 जबकि बहरूपी तथा कंकु का निर्माण हुआ. इसके बाद ठेठ 1980 में काशी नो डीकरो और भवनी भवई (केतन मेहता) तथा 1990 में परसी आती है. इस बीच कर मुक्ति का लाभ होने की कोशिश में कई महत्वहीन निर्माता फिल्म निर्माण में उतर पड़े और उन्होंनें सौराष्ट्र की लोक कथाओं का सारा भंडार एक तरह से खाली कर डाला. ग्रामीण परिवेश, वेशभुषा, पगड़ी, तलवार तथा चोइक चुड़ीदार पजामा आदि गुजरात की पहचान बन गए और हिंदी की तरह उनका भी निश्चित फॉर्मूला बन गया. इस फॉमूले में लोककथा से ली गई कहानी, थोड़े से चमत्कार, रास गरबा तथा दोहे शामिल थे. रामानंद सागर ने भी इस दौर में गुजराती फिल्में बनाई और इसी फॉमूलों के चलते अमजद खान जैसी प्रतिभा को बर्बाद किया. धीरे धीरे ऐसी फिल्मों का ही ग्रामीण दर्शक वर्ग तैयार हो गया और शिक्षित वर्ग ने गुजराती सिनेमा के नाम से ही नाक-भौं चढ़ाना शुरू कर दिया. 

सन् 1934 में एक फिल्म संसार लीला आई थी. इसमें खानपान की इज्जत बहू का चित्रण था. यह आदर्श बहू कितने ही विषम परिस्थितियों में मेहनत मजदूरी करके परिवार का पालन पोषण करती है. आदर्श नारी का यह पात्र गुजराती फिल्मों में सतत आता रहा. संसार के सादे गुण जिस स्त्री में हो गुण सुंदरी कहलाती है. इसिलिए गुण सुंदरी गुजराती सिनेमा की एक प्रतिनिधि फिल्म है. वर्षों बाद गुण सुंदरी नो घर संसार आई लेकिन सरस्वती चंद्र हिंदी में बनी. इसे गुजराती में बनाने का सहास किसी ने क्यों नही किया?

गुजराती फिल्मों में नारी पात्रों के बारे में जो सर्वेक्षण अहमदाबाद की प्रो. इला पाठक, रमा शाह ने किया उसके नतीजे बड़े दिलचस्प रहे. इस सर्वेक्षण के लिए गुजराती की 26 फिल्मों को चुना गया. इनके कुल 49 स्त्री पात्रों में से 36 पात्र गृहणियों के थे. इनमें से अधिकांश गृहणियों को लाचार और असहाय दिखाया था. परदे की हिंदी नारियों की तरह यो गुर्जर नारियां भी पति परायण, पति के पैरों में गिरने वाली, आंसु बहाती पराधीन नारी थी. कुछ लोक कथाओं में जो राजपुतानी का पात्र आता है वो अपवाद स्वरूप ही है. इनके अलावा स्त्री पात्र पर किसी मुसीबत के आते ही वो भजन गाते हुए या भगवान की मुर्ति की ओर दौड़ते हुए दिखते हैं. स्वतंत्र व्यक्तिव का धनी कोई स्त्री पात्र कभी कभी देखने को मिलता है. नारी अपने बल पर शायद ही कभी कोई फैसला कर पाती है. स्त्रियों को बांध रखना या उनसे मार पीट करना गुजराती फिल्मों में सामान्य बात है. पौराणिक कथाओं पर आधारित ये फिल्में बेतुके चमत्कारों से भरपुर होती हैं. 1940 के अर्से के बाद रणजीत कम्पनी ने अछूत फिल्म हिंदी के बाद गुजराती में भी बनाई और दोनों की ही नायिका गोहरबानू थी. गुजराती फिल्मों की पहली उल्लेखनीय अभिनेत्री होने का श्रेय उन्हीं को प्राप्त है. उन्हौने इस वर्ष की कुछ अन्य फिल्मों में भी काम किया था. इस तरह गोहरबानू तथा निरूपारॉय दोनों को ही हम द्विभाषी अभेनित्रीयां कह सकते है. ऐसी अभिनेत्रियां ज्यादा नहीं है, जिनकी खोज तथा विकास गुजराती फिल्मों ने ही किया हो. वैसे गुजराती सिनेमा के प्रारम्भ काल की अधिकांश अभिनेत्रियॉ असल गुजरात की थी और निरूपरॉय इनमें सबसे अधिक प्रभावशाली थी. 1948 में गुण सुंदरी से प्रारंभ होने के बाद उन्हे बरसों गुजराती परदे पर देखा गया. बाद में गुजराती फिल्मों में मंदी का दौर प्रारम्भ होने पर वे क्षेत्रीय से बढ़कर राष्ट्रीय हस्ती बन गई. मंगल फेरा आदि में गरबा करती निरूपा सब के दिलों में बस गई. बीते बरसों में हिन्दी गुजराती फिल्मों में आना जाना करने वाली अभिनेत्रियों में अरूणा ईरानी की नाम महत्वपूर्ण है जिन्हौने असरानी तथा दूसरों के साथ कई फिल्मों में काम किया. वो संजीव कुमार के साथ भी कईं फिल्मों में नायिका बन कर आई. कुछ फिल्मों में जयश्री टी भी मुख्य भुमिका निभाती नज़र आई.  काशी नो डीकरो वाली रागिनी भी आदर्श नायिका बन सकती भी लेकिन रंगमंच उनकी पहली पसंद होने के कारण फिल्मों को उनका लाभ नही मिल पाया. मल्लिका साराभाई भी काफी प्रतिभाशाली थी और किरणकुमार के साथ उनकी जोड़ी एक ज़माने में काफी मशहुर पर क्षणिक ही रही. मेंदी रंग लाग्यो में राजेन्द्रकुमार की नायिका उषाकिरण थी. अखंड सौभाग्यवती से आशा पारेख ने भी ज़ोरदार धमाका किया था लेकिन कुलवधू जैसे एक आध-अपवाद को छोड़ वे भी गुजराती चलचित्रों से दूर रही. प्रारम्भिक दौर में जो स्थान निरूपरॉय का थ वहीं 70 के दशक में स्नेहलता का रहा पर वो कर्नाटक की थी. स्नेहलता दिखने में काफी आकर्षक तो थी ही धीरे धीरे उन्होंनें गुजराती भाषा पर भी नियंत्रण पा लिया था. 70 के दशक में कई बाहरी कलाकारों का प्रवेश हुआ. स्नेहलता, असरानी, किरणकुमार के अलावा नसीरूहदीन शाह, स्मिता पाटिल तथा संजीव कुमार जैसे राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों का आगमन हुआ.
गुजराती फिल्मों के उदभव और विकास में यों तो कई लोगों का योगदान रहा लेकिन कुछ नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहै. इन सबमें पहला नाम द्वारकादास संपत का है.
गुजराती फिल्मों के उदभव और विकास में यों तो कई लोगों का योगदान रहा लेकिन कुछ नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय रहै. इन सबमें पहला नाम द्वारकादास संपत का है. संपत ने कोहनूर फिल्म के झंडे तले कई मुक तथा अकल नो बारदान नमाक सवाक् फिल्में बनाई. ऐसे लेकिन कुछ अनजान से सर्जक थे मणिलाल जोशी. वो भी मूक फिल्मों में सतर्क रहै लेकिन 1927 में 34 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया. बहुत कम लोगों को पता होगा कि महा गुजरात आंदोलन के प्रणेता इंदुलाल याज्ञिक ने पावागढ़ नो प्रलय नामक फिल्म बनाई थी. विट्ठलभाई पंचोरिया ने महात्मा गांधी पर एक वृत चित्र तथा विख्यात लेखक जयंति दलाल ने 1934 में बिखरे मोती बनाई थी. सागर फिल्म्स वाले चिमनलाल देसाई का योगदान भी काफी महत्वपूर्ण है. रणजीत के चंदूलाल शाह तथा रणजीत छोड़ कर आने वाले रतिभाई भी गुजराती फिल्मों के विकास में भागीदार बने. चिमनलाल तथा कमा. मुंशी दोनों भरूच के रहने वाले थे.

गुजराती फिल्मों के 60 वर्ष के इतिहास में दस-बारह फिल्मों के नामोल्लेख के बाद ही पूर्ण विराम या प्रश्नचिन्ह लग जाता है. ‘मां खोंडल तारो चमत्कारो’ तथा ’चंदन चावांकी’ ’मारी हेल उतारो राज’ तथा ‘बहरूपी’ भी है. जिसे पुरस्कार भी मिला लेकिन बिंदु की भुमिका वाली ‘जमाई राज’ अभी भी डिब्बों में ही बंद है. अफसोस की बात है कि हमारे यहां दूसरे समाज की समस्याओं को प्रतिबिंबित करने वाली फिल्में बन ही नही पाती. गुजरात में बेकारी, तंगदिली, सरकारी भ्रष्टाचार, जातिवाद, संप्रदायवाद है तथा स्त्रियों को त्रास भी दिया जाता है. नर्मदा बांधों ने पर्यावरण जैसी समस्याएं भी खड़ी की हैं. इनकी तरफ विधायकों से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी उंगुली उठाते है लेकिन गुजराती फिल्मों में ये सवाल नहीं उठाए जाते. गुजरात के फिल्म निर्माताओं ने क्या शुतुरमुर्गपन अपनाया हुआ है. गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन तथा अन्य आंदोलनों की चर्चा सारे देश में हुई मगर गुजराती फिल्मों ने उनका कोई नोटिस नहीं लिया. हमारे सिनेमा का हमारे सम-सामायिक जीवन के साथ कोई संबंध नहीं है.
गुजरात में फिल्म विकास निगम हे लेकिन वह क्या करता है यह कोई नहीं जानता. 2-4 फिल्म समारोह के आलावा उनका कोई काम नज़र नहीं आता. गुजराती सिनेम का कोई प्रमाणिक इतिहास भी हमारे पास नही है.
गुजरात में फिल्म अभिनय तथा दिग्दर्शन का प्रशिक्षण देने की भी कोई व्यवस्था नहीं है. पुणे के संस्थानों में भी ज्यादा गुजरातियों का प्रवेश नहीं होता. गुजरात में फिल्म विकास निगम हे लेकिन वह क्या करता है यह कोई नहीं जानता. 2-4 फिल्म समारोह के आलावा उनका कोई काम नज़र नहीं आता. गुजराती सिनेम का कोई प्रमाणिक इतिहास भी हमारे पास नही है. पुरानी फिल्म्स के प्रिंट्स भी नही हैं. अछूत या गुण सुंदरी जैसी फिल्म अब देखना चाहैं तो ये फिल्म कहां मिलेंगी? गुजराती फिल्मों के निर्माताओं की तस्वीरें तक देखने को नहीं मिलती और ना ही पुराने गीत कही सुनने को मिलेंगे. गुजरात फिल्म विकास निगम इन मामलों में अच्छे समीक्षकों और जानकारों की सेवाएं क्यों नहीं लेता आदि प्रश्न महत्वपूर्ण हैं और उनके उत्तर खोजें जाने चाहिए. 

This article is a reproduction of the original published in Bharatiya Film Varshiki '92

 

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