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घर का सुख जलाकर सिनेमाघरों को जगमगाने वाले ये सिनेमा आपरेटर

01 Oct, 2020 | Archival Reproductions by Cinemaazi
An image of the old Globe cinema hall in Kolkata. Image courtesy: whatsuplife.in

लाखों, करोड़ों की लागत से बननेवाली फिल्में जिन हाथों हमारी नजरों के सामने गुजरती हैं, वे हाथ सिनेमा आपरेटर के हैं। सिनेमा आपरेटर, जिन्हें न कभी हमने देखा है, न उन्हें जानने की चेष्टा ही की है। सिनेमा हाल में छोटी सी तकनीकी गड़बड़ी हुई कि हमारे मनोरंजन में बाधा पहुंची। इन बाधाओं को झेला जाता है भद्दी-भद्दी गालियों और कर्णभेदी सीटियों के जरिये।

कौन हैं ये सिनेमा आपरेटर? कैसी होती है उनकी ड्यूटी? किन दिक्कतों को अपना कर्तव्य मान कर झेल रहे हैं सब कुछ? क्या कभी किसी ने सोचा है, यदि ये हाथ काम करना बंद कर दें, तो संसार के सारे सिनेमाघर बंद हो जाएं? पर, कितना उपेक्षित है आपरेटरों का संसार!

जब मैंने आपरेटरों की कठिनायों की जानकारी लेनी चाही तो कई दिक्कतों का सामना करना पड़ गया। एक ने तो यह कहते हुए टाल दिया कि इससे कुछ होने जाने को नहीं। मालिक नाराज हो गए तो बस हमारी छुट्टी। एक कस्बेनुमा शहर के सिनेमा व्यवस्थापक ने यह कहकर आपरेटरों से बात करने की अनुमति नहीं दी कि मुख्य आपरेटर छुट्टी पर है। अभी ’हेल्परों’ से काम लिया जा रहा है। मैं बाद में आऊं।

ऐसे कई सिनेमाघरों के लाइसेंसशुदा आपरेटर छुट्टी पर नजर आए। वहां काम करने वाले या तो बेकार थे अथवा चाय-पान भर की मजदूरी पर अनिश्चित भविष्य की आशा में टंगे थे कि बाद में काम मिल जाएगा।

इन परिस्थितियों में बमुश्किल एक आपरेटर इस शर्त पर बातें करने को राजी हुए कि यदि नाम-पता नहीं दिये जाएं तब कुछ कहेंगे। आश्वासन पा कर ढेर सारा गुबार उगल दिया।

“कठिनाई! अरे यह पूछिए कौन सी कठिनाई नहीं है, इस पेशे में। वेतन पर हम दस रोज भी नहीं चल पाते। जुबान हमेशा बंद रखनी पड़ती है। बारह तेरह घंटों की ड्यूटी के लिए कम से कम सिनेमाघर में तीन या चार आपरेटर तथा उतने ही हेल्परों का होना हरूरी है। किंतु कहां होता है ऐसा? अब हमें देखिये, एक आपरेटर मैं हूं। साथ में दो हेल्पर हैं। बस हम तीनों बारह बजे दिन से बारह बजे रात तक जूझना है। अपनी मजबूरी की अभिव्यक्ति के माने है, नौकरी से भकट्टा!”

ऐसे सिनेमाघरों के आपरेटरों की स्थिति क्या रही होगी, यह सहज ही अनुमान लगाता हुआ वैद्यनाथ पिक्चर पैलेस, देवधर के व्यवस्थापक से मिलता हूं। वे सहर्ष अपने आपरेटरों से मिलवाने को तैयार हो जाते हैं।

छत्तीस वर्षीय श्री प्रभूचंद्र गिरी ने अपनी कार्य विधि की नजदीकी जानकारी दी। कहा, “सभी जगह सिनेमा आपरेटरों के वेतन ड्यूटी की तुलना में नगण्य है। कई जगहों की खाक छान मारी है मैंने। औसतन यहां ठीक रकम मिल जाती है। हाल की व्यवस्था अच्छी है। अतः दिक्क्तें कम उठानी पड़ती है। मशीन अच्छी है, बिजली फेल होने की स्थिति में जेनेरटर से काम लेते है।
 

महेन्द्रकुमार


मुसीबत के मारे

“सिनेमा आपरेटर माने ही दिक्कतों का पिटारा। सिनेमाघर के अन्य कर्मचारियों की तुलना में हमारी ड्यूटी भिन्न और जटिल है। बारह घंटों से अधिक की ड्यूटी। हर पल चैकस। पर्दे पर सब कुछ ठीक है न। अतः हर क्षण निगाह पर्दे पर। भीड़वाली सड़क पर माने हम वाहन चला रहे हो। नजर हटी कि दुर्घटना। थोड़ी सी असावधानी में कुछ भी गड़बड़ी हो सकती है। हाल के फर्नीचर, फिल्मों के प्रिंट क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। मालिक को अनावश्यक हर्जाना लग सकता है। दर्शक मालिक तथा डिस्ट्रीब्यूटर सभी का अंकुश एक साथ बना रहता है। बारह घंटों की ड्यूटी खड़े रह कर बितानी पड़ती है। आराम के कुछ क्षण दूसरे मशीन के चालू रहने के दरम्यान अवश्य मिल जाते हैं, किंतु उन क्षणों  में भी हम खाली नहीं बैठ सकते। पूरी केबिन की जवाबदेही होती है हम पर। जरा सा कहीं खटका हुआ कि कान खड़े। हर यंत्र की जांच परख शुरू हो जाती है। कभी-कभी प्रिंटों में भी गड़बड़ी रहती है, जो दर्शकों की बौखलाहट का कारण बनती है। अतः उनकी जांच हम प्रदर्शन के पूर्व कर लेते है। उस वक्त थोड़ी सफाई से गड़बड़ी नजरअंदाज कर दी जाती ह।"

प्रभूजी नून शो की तैयारी में जुट जाते हैं। दूसरे युवा आपरेटर महेन्द्रकुमार बताते हैं, “हमारा वेतन ड्यूटी की तुलना में आधी से भी कम आंकी जाती है। कभी-कभी दर्शकों की शिकायत होती है, रील काट लिया। अब उन्हें कैसे समझाएं, रील काट लेना उतना आसान नहीं, जितना वे समझते हैं। हम ऐसा क्यो करने लगे? हां, रील पुरानी हो जाने पर ऐसी शिकायत संभव है, जिसके लिए हम विवश है। मशीनी खराबियों के लिए हम क्या कर सकते हैं? प्रयास रहता है प्रदर्शन अच्छी कोटि का हो ताकि दर्शकों को पूरा आनंद मिल सके। मशीनें विद्युत चालित हैं अतः उनके झटके का खतरा बना रहता है। अपनी दिक्कतें सुननेवाला मालिक के सिवा कोई नहीं। हमारा इतना बड़ा संसार पर असंगठित। इस लाइन में इतने लोग बेकार है कि संगठित हो नहीं पाते। मुझे शिकायत करने के पूर्व चार-छः हाथ मेरी जगह पाने की होड़ में दौड़े जाएंगे।

मैं पूछता हूं, दर्शकोें की गालियों के रूप में तीखी प्रतिक्रियाएं किस रूप में प्रभावित करती है? महेंद्रजी के चेहरे पर विवशता के भाव प्रकट होते हैं। कहते हैं, “भाई पहली दफा जब ऐसी स्थिति का सामना हुआ था तो वितृष्णा से मन भर उठा। सोच कर देखें, यदि उस वक्त सचमुच हमारी मां-बहनें हाल में सिनेमा देख रही हों तो क्या बीत सकती है। हम सबों पर? हम भी दर्शकों के भाई है। फिर अपने भाई को गाली देना स्वयं को अपमानित करना है।

शो की तीसरी घंटी बज उठती है, महेन्द्र को मुक्त कर मैं तेईस वर्षीय हंसमुख स्वभाव वाले कैलाशप्रसाद सिंह की ओर मुड़ता हूं। कैलाश इसके पूर्व एक छोटी जगह के अव्यवस्थित से सिनेमाघर में थे। वहां नब्बे रुपये प्रतिमाह की दर से वेतन पाते थे। वैसी जगहों में व्यवस्था को अपनी कठिनाइयों से अवगत कराया कि नौकरी से छुट्टी। वैसे सिनेमाघरों में मालिक या व्यवस्थापकों को व्यवहार भी ठीक नहीं होता। मशीनें ठीक नहीं रहतीं। हाल की व्यवस्था की ओर उचित ध्यान नहीं दिया जाता। पुरानी घिसी-पिटी प्रिंट सस्ती दर पर उठा लाते हैं। साउंड की व्यवस्था जैसी जैसी, फिर भी खीचें जा रहे हैं। और इन सारी खामियों को लक पटक दिया जाता है हम आपरेटरों पर। अब मशीन चलाएं कि यह ध्यान दें कि रील कहां कटा हुआ है, कहां घिस गया है?
कैलाश सिंह


मजबूरी ही मजबूरी

नवनिर्मित मनोरमा पिक्चर पैलेस, जसीडीह के बयाीस वर्षीय आपरेटर श्री पुनीतप्रसाद सिंह अपनी ड्यूटी के दरम्यान भी एक लुंगी तथा साधारण-सी पैबंद लगी कमीज में मिले। यह उनकी विवशता है। ऐसा उन्होंने बतलाया। इक्क्ीस वर्षों से बेहतर व्यवस्था की तलाश में बिहार के कई शहर-कस्बों के सिनेमाघरों की पुनीत ने छान मारी है। अंत में इस निष्कर्ष पर आए कि जिंदगी के बेहतरीन बीस-इक्कीस वर्ष भटकने में गुजार दिया। अनुभवों का बड़ा पिटारा है उनके पास। सुनाते हैं, “कोई बेहतर स्कोप नहीं है। हर जगह आपरेटरों की एक सी स्थिति। आज हमसे बेहतर तो किसी दफ्तर का चपरासी है। आर्थिक कठिनाइयां इस रूप में हैं कि अपने परिवार को सिर्फ दाना-पानी दे पा रहा हूं। बच्चे बड़े हो चले हैं। न तो कभी वैसा पारिश्रमिक मिला कि उन्हें पढ़ा-लिखा सकूं। न ही कभी कहीं पर्व त्योहार में बोनस मिला कि उन्हें सलीके की कमीज-फ्राक दे सकूं। बिटिया बड़ी हो चली है। इसके हाथ पीले करने है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो एक पैसा भी तो नहीं बचा पाया कभी। सब ऊपर वाले पर निर्भर है।

“हमारी ड्यूटी गेटकीपरों, बुकिंग बाबुओं, गार्ड आदि से सर्वथा भिन्न है। उन्हें सिर्फ शो शुरू तथा समाप्त होते वक्त सक्रिय रहना पड़ता है। अपना तो हर क्षण ड्यूटी को समर्पित है। वेतन को हमारी ड्यूटी की महत्ता के अनुरूप कभी नहीं आंका गया। इतना बड़ा सिनेमा व्यवसाय और तन ढांपने को हमारे पास पूरे कपड़े नहीं। कृपया आपरेटरों की संवेदनाएं उन करोड़पति, अरबपती सिनेमा व्यवसायियों तक पहुंचाएं। उन्हें इस व्यवसाय से जुड़े हर व्यक्ति को हमसे सहानुभूति होनी चाहिए।”
 
सीताराम मंडल


नेशनल इंस्टीट्यूट, पूर्व रेलवे, जमालपुर के कर्तव्यनिष्ठ आपरेटर 25 वर्ष सीताराम मंडल से भी उनके काम के दरम्यान ही मुलाकात हुई। वे अपने आप में संतुष्ट से दिख रहे थे। प्रसन्नता के साथ अपनी अभिव्यक्ति दी, “यह सिनेमाघर रेल विभाग द्वारा संचालित है, अतः अन्य घरों की तुलना में यहां की स्थिति बेहतर है। वेतन के रूप में ’सेमी रेल्वे वेजेज’ मिलता है। विभाग द्वारा वर्दी मिली हुई है। आठ घंटे से अधिक की ड्यूटी के लिए ओवर टाइम मिलता है। रेल कर्मचारियों जैसी अन्य सुविधाएं भी मिली हुई है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमें दिक्कतें नहीं उठानी पड़तीं। अपने कर्तव्य का निर्वाह जितनी तत्परता से कर सकूं, करता हंू, फिर भी दर्शक असंतुष्ट। दर्शकों की अलग-अलग मनोवृत्तियां होती हैं, सबों को झेलना आसान नहीं होता।

प्रोजेक्टर चलाने के साथ-साथ हमारे जिम्मे केबिन की सफाई, मशीन की जांच, रील की जांच, हाल के अंदर रिकार्डिंग, वार्निंग घंटी आदि सारे कार्य आते हैं।

पर्व त्योहार में हमें छुट्टियां नहीं मिलतीं।  यदि छुट्टी लिया भी जाए तो उन्हें ’कैजुअल लीव’ के रूप में लेना पड़ता है। सप्ताह में एक दिन का अवकाश मिलता है।

“हाल में किसी बात के लिए गालियां बकना अच्छी बात नहीं। ऐसी मनोवृत्तियां छोटे शहर-कस्बों में ज्यादा पायी जाती है। जहां के लोग शिक्षित हैं, समझदार हैं, धीरज बना रहता है।”

अपनी नीजी जिंदगी की कठिनाइयों से अवगत करायेंगे? मैं कुरेदता हूं।

मंडलजी के चेहरे पर एक क्षीण-सी मुस्कान उभर आती है। कहीं खोते नजर आते है, “सच! उन क्षणों की विवशता काट खाने लगती है। जब काम से लौटता हूं, परिवार का हर सदस्य गहरी निद्रा में समा चुके होते हैं। जाड़ा हो या गर्मी, चाहे मुसलाधार वर्षा ही क्यों न हो, नित बारह बजे रात्रि के बाद ही छुट्टी मिलती है। जब ड्यूटी के बंधन से मुक्त हम घर पहुंचते हैं तो कितनी प्यास होती है उन क्षणों में उनसे दो बाते करने की। रात देर से सोने की वजह से सुबह उठते ही ड्यूटी की तैयारी। वक्त नहीं निकाल पाता कि बाजार से साग-सब्जी भी ला सकूं। यह जवाबदेही भी पत्नी ही निभाती है।”

इंस्टीट्यूट के दूसरे आपरेटर श्री विष्णुदेव साह भी बीच-बीच में हमारे वार्तालाप में भाग ले रहे थे। अपनी ओर से आप सिनेमा आपरेटरों की बेहतर जिंदगी के लिए कुछ सुझाव देंगे? -मैं पूछता हूं।

“आपरेटरों की कठिनाइयों में उनका अल्प वेतन, उनकी कड़ी ड्यूटी, जवाबदेही तथा पारिवारिक भरणपेषण आते हैं। मेरा सुझाव है कि ड्यूटी के अनुरूप उन्हें सभी सुविधाएं दी जाएं। ओवरटाइम दिये जाएं, बोनस दिये जाएं नये आपरेटरों को लाइसेंस देने के पूर्व उनका ट्रायल 35 मी.मी. मशीन पर लिया जाना चाहिए। अमूमन 16 मी.मी. की मशीन ही काम में लायी जाती है। यह वैसी बात हुई, घुड़सवारी के लिए साक्षात्कार हो ओर सवारी के लिए गधा मुहैय्या किया जाए!

This article was originally published in Madhuri magazine on 27 April 1984 issue. It was written by Prashant Kumar Sinha.
Images of the technicians are taken from the original article

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