फिल्म 'अनुभव' का संगीत एक अपूर्व अनुभव - Kanu Roy
संगीत अपनी विशेषताओं की अनेक रंगीनियों से युक्त एक स्वतंत्र कला है, लेकिन जब यह किसी फिल्म का एक अंग बन जाता है, तब उतना स्वतंत्र नहीं रह पाता। मेरे विचार में यहीं आकर उलझने पैदा हो जाती है। व्यावसायिक सिनेमा ने संगीत को बहुत अच्छी तरह अपनाया है और व्यावसायिक सिनेमा जगत के लिए यह एक बहुत बड़ा व्यापार सिद्ध हुआ है। साधारणतः व्यावसायिक सिनेमा में संगीत का अर्थ गानों से लिया जाता है।
आकर्षक गाने और कर्णप्रिय धुनें यही इसकी विशेषताएँ हैं। अनेक लोकप्रिय गानों की रचना एक कठिन काम हो सकता है, लेकिन ’उसकी कहानी’ और ’अनुभव’ जैसी लीक से हट कर बनने वाली फिल्मों में दृश्यों के पूरक रूप में संगीत की रचना करना कहीं ज्यादा जटिल तथा सृजनात्मक कार्य है।
अधिकांशतः संगीत-निर्देशकों के विपरीत मैंने संगीतकार के रूप में अपना स्वतंत्र व्यवसाय एक ऐसी फिल्म से आरंभ किया जो अप्रचलित सिद्धांतों के आधार पर बनायी गयी थी। वह फिल्म थी ’उसकी कहानी’। ’अनुभव’ मेरी दूसरी फिल्म है। ’अनुभव’ की विषयवस्तु पुरुष और नारी (पति-पत्नी) के संबंधों से ताल्लुक रखती है और यह मानव अस्तित्व की जटिलतम विषय वस्तुओं में से एक है।
’अनुभव’ के साउंड-ट्रैक को तीन भागों में बाँट सकते हैं। मधुर, कर्कश और अशांत। प्रच्छन्न रूप से विषाद सूचक ध्वनियाँ भी उसमें आयी हैं, लेकिन चूँकि वे प्रच्छन्न ही है, इसलिए उन्हें विस्तार देकर मैं उभारना नहीं चाहता।
मेरी रचना शैली सदैव संबंधित फिल्म के दृश्यों और पात्रों की मनः स्थितियों के अनुकूल ही होती है। जैसी आवाज की जरूरत होती है, उसके अनुसार ही मैं वाद्य-यंत्रों का चुनाव करता हूँ। उनके बारे में पहले से ही कुछ तय नहीं कर लेता। कई जगह मैंने आकर्षक पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों के साथ अपने पुराने लोक-वाद्य यंत्रों का प्रयोग भी किया है। हो सकता है, यह कुछ उग्र और गलत सा लगे, लेकिन मुझे लगा कि इसकी जरूरत है और मैंने ऐसा किया।
कहीं-कहीं कुछेक वाद्य-यंत्रों का मैंने अनूठे रूप में भी प्रयोग किया है। जैसे एकार्डियन का बिना कोई तार बजाये प्रयोग करके उसकी संगीतात्मक लय और ध्वनि को दबा कर रिकार्ड किया। इससे एक रहस्यमय प्रभाव उत्पन्न हो गया। और यही प्रभाव लाना जरूरी भी था।
फिल्म के तीन मुख्य पात्रों में मैंने पत्नी के लिए तार शहनाई, पति के लिए ’सितार’ तथा बूढ़े के लिए ’सरोद’। नामावलियों के साथ चलनेवाला प्रारंभिक और अंतिम दृश्य (चरम आत्मज्ञान वाला दृश्य) का संगीत एक ही है। इसकी मुख्यतः आनंद भैरवी लोक धुन पर आधारित है। जहाँ नामावलियाँ आरंभ होती है और अंतिम दृश्य में, जहाँ पर आत्मज्ञान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है, वे ऐसे क्षण हैं। जो अभिलाषा का स्फुरण उत्पन्न करते हैं। यही कारण है कि नामावलियों का संगीत और अंतिम दृश्य की संगीत रचना वाइब्रोफोन ध्वनियों से की गयी है। उसके बाद आरंभ होती है ’तार शहनाई’, और उसके पीछे ’सितार’ अंततः उनमें ’सरोद’ के सम्मिश्रण से एक अर्थपूर्ण मधुर संगीत की उत्पत्ति होती है।
’अनुभव’ का साउंड ट्रैक तैयार करने में यद्यपि हमने कम से कम वाद्या यंत्रों का उपयोग किया है, फिर भी अधिकांश स्थानों पर प्रति दिन अपने आसपास सुनायी पड़ने वाली आवाजों और शोर का ही प्रयोग किया गया है। घड़ी की टिकटिक भले ही उबाने वाली और एकरस लगती हो, लेकिन अर्थपूर्ण जरूर है। तीनों मुख्य पात्रों का जब अंततः एक-दूसरे से आमना सामना होता है, ऐसे निर्णायक क्षणों में सायरन की आवाज उनकी आंतरिक उथल पुथल को व्यक्त करने में जितनी सफल रही उतना शायद किसी भी तरह का पार्शव संगीत न हो पाता।
इसके अतिरिक्त आकाशवाणी की प्रारंभिक सांकेतिक धुन का प्रयोग चरम मनःस्थिति में इतना प्रभावशाली रहा, जितनी कोई भी जानी-पहचानी प्रतिदिन सुनी जानेवाली आवाज जो शायद फिल्म में कभी नहीं रही।
मैं पूर्ण विश्वास के साथ कहता हूँ कि कितना भी कल्पना शील और सृजनात्मक संगीत क्यों न होता, वह जीवन की नीरस दिनचर्या को इतने सही रूप में व्यक्त न कर पाता जितना यह सांकेतिक संगीत कर सका। इन प्रभावपूर्ण ध्वनियों को इतने मर्मस्पर्शी ढंग से प्रयोग में लाने के लिए मेरे निर्णयों में ’अनुभव’ के निर्देशक भी बहुत अधिक सहायक रहे हैें। संभवतः यह पहली हिंदी फिल्म है, जिसमें पार्शव संगीत घड़ी की टिकटिक, टेलिफोन की घंटी, रेडियो की आवाज तथा नित्य प्रति की अन्य घरेलू ध्वनियों में पूर्ण रूपेण सांविलीन हो गया है।
This article was published in 'Madhuri' magazine's 12 May 1972 edition written by Kanu Roy.
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