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मुन्ना बजरंगी ऐसे दो दोस्तों की कहानी है, जो गाँव से चलकर शहर आते हैं एक ऐसी जमीन ढूंढने, जिसके उपर खड़े होकर वो यह कह सके की वो भी समाज के सफल इन्सान हैं। पर यह सोच उन समाज के ठेकेदारों को रास नहीं आती, जो समाज को अपने ताकत बल पर एक कोठे से ज्यादा अहमीयत नहीं देते। उसी समाज के एक ठेकेदार का नाम है बबुआ, जिसका अत्याचार गाँव के लोगों के लिये धर्म बन चुका है, पर अत्याचार कितना भी ताकतवर क्यों न हो धर्म नहीं बन सकता और उसी अत्याचार के खिलाफ समाज का इमानदार और निष्ठावान आदमी मुखिया आवाज उठाया है। और उस आवाज को दबाने के लिये एक आवाज और होती है, जो बबुआ के मुंह से नहीं उसकी बंदूक से निकलती है। और मुखिया के बदन से निकला खून उसकी पत्नी कौशल्य के मांग का सिंदूर धो डालता है। और एक सुहागन का सुहाग उजड़ने के बाद उसके जीवन का मतलब नहीं होता और वो कसम देती है, अपने बेटे बजरंगी को, की बाप के तेरहवी से पहले अगर बाप को मारने वाले का सर काट कर नहीं लाया तो अपने बाप का बेटा नहीं।
तो क्या बजरंगी साबित कर पायेगा कि उसके रगो में दौड़ने वाला खून उसके बाप का है? बजरींगी का दोस्त मुन्ना यह कर पायेगा अपने दोस्त बजरंगी के लिये, जिसके पास हिम्मत और हौसले के अलावा कुछ भी नहीं।
इन्हीं सवालों को लेकर एक फिल्म जो जवाब तो देती है, पर छोड़ देती है आपके जेहन में एक सवाल!!!
[From the official press booklet]