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Zubeidaa (2001)

  • LanguageHindi
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ज़ुबैदा (करिश्मा कपूर) कहानी है, एक नवयुवक रियाज (रजित कपूर) की जो यह भी नहीं जानता कि उसकी माँ कैसी थी, उसका व्यक्तित्व कैसा था, उसकी जीवन शैली कैसी थी। होश संभालने पर रियाज अपनी इसी उत्सुकता पर काबू नहीं रख पाता और यहीं से शुरु होता है एक ऐसा सिलसिला जिसके तहत एक जवान बेटा अपनी माँ की असली शख्सियत को खेजने के लिए निकल पड़ता है। ज़ुबैदा कहानी है इन यादों से भरे सफर की, और जैसे जैसे रिायज अपनी माँ के बारे में ज्यादा जानकारी हासील करने लगता है, उसके सामने उसकी माँ के जीवन के विभिन्न पहलू उसके सामने आते हैं जो इस बात को बेशक साबित करते है कि उसकी माँ एक साधारण स्त्री नहीं बल्की एक अनोखी औरत थी। रियाज अपनी माँ का नाम है ज़ुबैदा।

ज़ुबैदा, बम्बई में बसे फिल्म निर्माता सुलेमान सेठ (अमरीश पूरी) निहायत खूबसूरत इकलौती बैटी है। सुलेमान सेठ ने कभी अपनी बेटी (ज़ुबैदा) की इच्छाओं को प्राथमिकता नहीं दी। सुलेमान सेठ की जिद्द हमेशा ज़ुबैदा के जीवन पर हावी रही और उनकी मनमानी सदा ज़ुबैदा की खुशियों को रौंदती रही। ज़ुबैदा बहुत चाहती थी कि वह फिल्मों में एक अच्छी अभिनेत्री के तौर पर काम करे पर सुलेमान सेठ ने ज़ुबैदा के इस अरमान को कुचल कर रख दिया। ज़ुबैदा की नामंजूरी के बावजूद सुलेमान सेठ ने ज़ुबैदा की शादी एक एैसे लड़के से कर दी जिसे वह पयार नहीं करती थी बल्की ठीक तरह से जानती तक नहीं थी। इस शादी ने ज़ुबैदा के दिलों दिमाग़ पर ऐसा घाव छोड़ा जिसे भरना ज़ुबैदा के लिए तकरीबन ना-मुमकिन था।

इसी दौरान ज़ुबैदा की जिन्दगी में एक नया मोड़ आता है और उसकी मुलाकात फतेहपूर के महाराजा विजयेन्द्र सिंह (मनोज बाजपेयी) से होती है। विजयेन्द्र सिंह ज़ुबैदा का दिल जीत लेते है और इस पयार की अगन दोनों को भस्म कर देने की भी संभावना रखती है। यह प्यार का रास्ता फूलों से भरा नहीं बल्मी सामाजिक रोड़ों से भरा पड़ा है।

क्या ज़ुबैदा के प्यार की शक्ति, तलवार बनकर इन काँटों को चीर सकती है?

क्या ज़ुबैदा इन सामाजिक बंधनों को तोड़कर अपनी प्यार की मंजील को हासील करती है?

इस सब सवालों का जवाब जानने के लिए देखिए एक अद्भुत औरत की अनोखी कहानी ज़ुबैदा सिर्फ पर्दे पर ही।

(From the official press booklet)