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School Master (1959)

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देश में शिक्षा का प्रसार करने और अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए राम प्रसाद अपने गाँव के स्कूल में हेडमास्टर हो गये। स्कूल में भैरव, मास्टर गदाधर की छः महिने की तंख्वाह दबाये बैठा था। राम प्रसाद ने मामला अधिकारियों तक पहुँचाया। भैरव को स्कूल की अध्यक्षता से हटा दिया गया। वासु नाम के एक विद्यार्थी ने राम प्रसाद का पैन चुराया। उन्होंने वासु को सज़ा देने की बजाये उसे पैन इनाम दे दिया।

भैरव ने राम प्रसाद का घर जला दिया, परन्तु स्कूल के विद्यार्थयों ने अपने गुरु के लिये नया घर बनाया। विद्यार्थियों ने प्राईमरी स्कूल को हाई स्कूल बनाने के लिये एक नाटक खेला। भैरव ने नाटक की आमदनी का रुपया चुरा लिया। भैरव जेल हो गई।

समय बीतता चला गया..............

भैरव जेल से छूटा तो गाँव काफ़ी दबल चुका था। राम प्रसाद के पास, रवी गोपी को उँची तालीम देने के लिये पैसा न था। भैरव ने रुपया दिया और राम प्रसाद ने प्रोनोट लिख दिया।

प्राईपरी स्कूल को हाई स्कूल बनने का राम प्रसाद का स्वप्न पूरा होने वाला था कि भैरव ने राम प्रसाद को घर नीलाम करने की धमकी दी। सीता ने रवि गोपी को बुलाया और कर्ज़ की बात छेड़ी। सब सोच विचार करने लगे।

इस सोच का क्या नतीजा निकला?

विद्यार्थियों ने अपने गुरु राम प्रसाद के लिये जो घर बनाया उसका क्या हुआ?

वासु, जिसे राम प्रसाद ने नया जीवन दिया, उसका क्या हुआ?

क्या भैरव को अपनी करनी का फल मिला?

इन प्रश्नों का उत्तर परदे पर देखिये।

(From the official press booklet)

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