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Bhala Admi (1958)

  • Release Date1958
  • GenreDrama
  • FormatB-W
  • LanguageHindi
  • Length3636.57 meters
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फूल और कांटे, अंधेरे और उजालेमे थोडा ही फर्क है। आंखें धोका खाती हैं और फुल के बदले आदमी कांटा तोंड लेती है। बिजलीकी चमक, आंखोंकी रोशनी भी साथ ले जाती है, अकल अगर साथ न दे तो भलाई बुराई बन जातीं हैं-जैसा के भगू की भलाई डाकूने अपनी बुराई का मददगार बना लिया। भगू सीधा साधा मोहोब्बत भरा दिल रखनेवाला, गरीब मांका एकलौता लडका था। अपने साथीयोमें मिल जलकर सुख-शांतीका जीवन बसर कर रहा था के डाकूवोकी लूटमार शुरु हुई। जमींदारके सताये हुये गाँववाले अपने गाँवको डाकूवोसे बचाने के लीये एक होगये लेकीन किस्मत के लिखे को कौन मिटा सकता है। गांवपर डाका पडा और लूटके माल के साथ चैधरी की लडकी कम्मू को भी उठा ले गये। अगर जमींदार अपनी बन्दूके बचाव के लीये गांववालोको दे देता तो शायद ये दिन देखना न पडता। लेकिन गरीब किसानोंसे जमींदार की जान जादा किमती थी। कम्मू के बगैर भगू की जिन्दगी में क्या रह गया। उसकी दुनिया लूट गई थी। दिलमें सन्नाटा ही सन्नाटा था। गांवके नौजवानोने चैधरी के लडके रामूकी सरदारी डाकूके हाथसे गाँवकी गई हुई इज्जत कम्मूको वापस लानेका फैसला किया। भग्गूभी उनके साथ साथ चला, ये बडी हुशियारीसे डाकूके अड्डेमें पोहोच गये और कम्मूको छुडानेका वख्त आही गया था के सबके सब डाकूके हाथोमे फस गये। डाकूके सरदारनें इस गलती की सजायें मौत का हुकूम सुना दिया। सब अपनी अपनी मौतका इन्तजार कर रहे थे के भगूनें अपनी जानपर खेलकर जिन्दगीकी आखरी लढाई लढी। ये अकल की लढाई थी। कम्मू भी आझादी भगू के लिये महंगी पडी। डाकूवो के सरदाने भगू के साथ वैसी ही चाल की। 
भगू की शराफत ही को भगूका जाल बना दिया। गावमें गांववालो की आझादी की खूशीमें पूजा हो रही थी और भगूकी मां चैधरीकी खुशामद कर रही थी के ये अधूरी पूजा न करो। अभी मेरा बच्चा डाकूओंके कैदमें है पहले उसे छुडा लावो फिर सब मिलकर पूजा करेंगे। लेकीन चैधरी अपने बच्चोंके मिल जानेके खूशीमें गरीब भगूकी मां का कहना न सून सका, डाकू के सरदारनें इसी मौकेसे फायदा उठाया। उसने भगूको ये सब कुछ अपनी आंखोसे देखनेका मौका दिया, और भगूकी राह बदलदी। जिन लोगोंके लिये भगूने सबकुछ किया था उन लोगोंने भगूकी रिहाईकी भी पर्वा न की। भगूकी माँ का भी कहना न माना, ये कैसे दोस्त है-ये कैसी मोहब्बत-ये कैसी दुनिया-भगूने दिलकी हर जंजीरें तोड दी, अब भगू एक बड़ा डाकू था। वो सबकी जिन्दगीका खतरा बन गया था। हरतरफ इसकी गिरफतारीके लीये इनामी इस्तेहार लगे लगे हुये थे, और भगू किसीकी हाथ न आता था। डाकू इतनी बडी ताकद को अपने हाथसे किसी किमतपर जाने देने के लीये तैयार न थे। भगोको अगर दुनियामें अब किसीकी फीकर थी तो सीर्फ मांकी, और डाकूवोके लीये ममता ही ऐसी बेढी थी जो भगूके पाँवमें ढालके, नेकीकी तरफसे भगूकी राह मोडने के लीये काममें लाई जा रही थी, रामू जैसा दोस्ट भगूका दुष्मन था। कम्मू के लिये अब भगू के दिल में कोई जगह न थी। कम्मू अपनी जानपर खेलकर डाकूवोके अड्ढेमें पोहोची, लेकिन भगूने उसे भी ढूकरा दिया। अब कौनसी ताकद थी जो भगूको भला आदमी बना सकती थी। उसे सीधी राहपर ला सकती थी, वो मां थी सीर्फ मां, लेकिन मांने अपनी ममतासे क्या काम लिया, चैधरी और जमीदारने किसतरहा अपनी भूल सूधारी-रामूने अपने दोस्त भगूके लिये क्या-कैसा गाँव, और गाँववालोकी तकदीर किस तरहा बदली-कम्मू का अंजाम क्या हुवा-ये सब कुछ आप अपनी आंखों से परदेपर देखीयें।
 

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