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Jai Hanuman (1948)

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संसार में सार क्या है? इसका उत्तर सबों ने दिया तो है, लेकिन सही अर्थों में कोई भी नहीं दे पाया।... फिर भी हमारे प्रचीन और अर्वाचीन विद्वानों, शास्त्रों, और पंडितों ने यदि संसार की सबसे बड़ी और प्रत्यक्ष सार्थकता बताई है, तो वह है - भक्ति।

हृदय की इस अतिकोमल भावना को भी दुनियावालों ने अपने शारीरिक सुख का साधन बनाना चाहा और उसका मनमाना फल मिलना उन्हें नसीब न हुआ तो वे आराधना के साथ साथ अराध्यदेव ईश्वर को भी पाखंड, और सन्तों के स्वार्थ का साधन कहकर कोसने लगे।

मनुष्यता और हृदय के इतने गहरे पतन को देखकर प्रकृति को भी क्षुब्ध हो जाना पड़ा, संसार को पतन की खाई से बचाने और मनुष्यता का उद्धार करने के लिए तब प्रकृति ने मनुष्य के कोमल हृदय से ईश्वर को जोड़ने के लिए, एक भावना को शरीर देकर इस संसार मे चिरंजीव किया-

उसका नाम है हनुमान!

हनुमान अजर और अमर हैं यही जब तुलसीदासजी ने श्रोताओं को समझाना शुरू किया तो उनकी उत्सुकता बढ़ने लगी- और गोसाईजी ने उस श्रद्धा, भक्ति और बलमयी मूर्ति के लौकिक जीवन की कथा सुनानी शुरू की!

सती अंजनी और पवनदेव के अलौकिक संसर्ग से महावीर हनुमान का जन्म हुआ, और बचपन के पाँच वर्ष भी न बीतने पाये थे कि माता के पूर्व-कष्ट के स्मरण से क्रोधित होकर बाल हनुमान ने सूर्य को ही मुँह में धर दबाया!.....

सारे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया परन्तु हनुमान टस से मस न हुए। इन्द्रदेव हारे; भगवान विष्णु की विनती से प्रेममयी माता अंजनी भी बाल-हनुमान के मुँह से सूरज न छुडा सकी। तब विष्णु भगवान ने उन्हें रामावतार के रूप में मिलने का और जीवन पर्यन्त अपनाने का वचन दिया-और तब बाल हनुमान ने सूर्य को अपने मुख से, और भगवान विष्णु को अपने हाथ से जाने दिया।

राम-नाम को जीवन-मंत्र बनाकर बाल-हनुमान समय के साथ साथ बढ़ने लगे; संगीत और विविध शास्त्रों में पारंगता होते हुए वे धीरे धीरे बुद्धिमान के तौर पर प्रसिद्ध हुए और किष्किन्धा के राजा वानर-राज सुग्रीव के महामंत्री बन गये।

........परन्तु राम-नाम की लगन जो लागी-लागी!

........और एक दिन मनुष्यलीला करते हुए भगवान श्रीराम सीता से बिछुड़कर बन-बन भटकते हुए ऋष्यमूक पर्वत की ओर जा निकले-हनुमान ने प्रथमदृष्टि में ही उन्हे पहचाने की कोशिश की किन्तु ईश्वर ने भक्ति से अपने को छुपाना चाहा, किंतु अब भक्ति आंसू बनकर आंखों में खिल उठी तो भगवान को भक्त से हृदय लगाकर मिलना पड़ा! ................

फिर क्या था? भक्त को भगवान, और भगवान को भक्त के मिलने पर जो कुछ होता है, वही हुआ! सारी वानर-सेना तैयार हो गई! और क्रमशः समुद्र-उड्डयन, सीता-खोज, लंका-दहन, घोर-युद्ध, राक्षस-संहार, रावण की मृत्यु, श्रीराम का अयोध्या में विजय-प्रवेश, यह सब कुछ हुआ, किंतु भक्त भगवान से अलग न हो सका!

छाया की तरह हनुमान, भगवान श्रीराम के साथ साथ चलने लगे! भगवान को भक्त ने जीत लिया! श्रीराम सीता से अलग हो गये किंतु हनुमान से अलग होना उनके लिए असम्भव हो गया!

एक दिन............

पर हाँ, यही तो इस कहानी का मूल है! इस 'यह' को देखने के लिए आप रजत-पट पर अवश्य देखिये- जय हनुमान!

(From the official press booklet)