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संगीत के सरताज - कुन्दनलाल सहगल

17 Nov, 2021 | Archival Reproductions by Maazi Magazine
Kundanlal Saigal

जब दिल ही टूट गया 
हम जीके क्या करेंगे

जनाब कारदार की फ़िल्म ’शाहजहां’ के एक नग़मे को, उनके ही कारदार स्टूडियो में, सहगल साहब की आवाज़ में रिकार्ड किया जा रहा था।

नौशाद साहब ने, यूंतो इससे पहले आधा दर्जन कारदार फ़िल्मों में अपना संगीत देकर धूम मचाई थीं, लेकिन पहला मौक़ा था जब वो अपनी मौसिकी में चार चांद लगाने जा रहे थे सहगल साहब की आवाज़ को अपनी धुन में पिरोकर। ज़ाहिर है माहौल काफ़ी नाज़ुक था। सहगल साहब के फ़न के जादू का डंका, कलकत्ता के न्यू थिएटर्स से बजाकर सारे हिन्दुस्तान में सुनाया जा चुका था, लिहाज़ा उनके फ़न का दबदबा बम्बईवाले भी महसूस कर रहे थे। अवाम के हर लब पर सहगल साहब का नाम मचलता था, और नौशाद साहब दिल ही दिल काफ़ी खौफ़जदा हुए जा रहे थे, जिस वजह से इतने बड़े फ़नकार के मुखातिब, तकल्लुफ़ और बेहिसाब मर्यादा का पास महसूस कर रहे थे। रियाज़ के बाद, सहगल साहब ने अपने सुर छेड़ना शुरू किया। सोज़ में, मखमूरी रंग तो हमेशा की तरह जवां था, मगर गले की खराश उन्हें बेचैन कर रही थी। सहगल साहब बार बार गाते रहे....बार बार नग़मा, सुर और सोज़ से महरूम होने लगता। नौशाद साहब की सिद्दत...मगर जुबां से कमबख्त लफ़ज़ भी किसतरह जुबां खोले?... करते करते चैदह बार रिटेक हो गया... नौशाद साहब इल्तजाओं और गुज़ारिशों से ही काम चला रहे थे... मगर सहगल साहब, उनके सीने में तूफ़ान उठाती हुई परेशानी को समझ गए। उन्हें इल्म था कि नौशाद साहब उनकी इज्ज़त करते हैं, जिसकी बदौलत सब्र का दामन उन्होंने नहीं छोड़ा, लिहाज़ा सहगल साहब नौशाद साहब के क़रीब जाकर उन्हें दिलासा देते हुए बोले नौशाद मियां... आपका नग़गा मैं पूरे रंग और राग में गाऊंगा... आपका गाना आपको खुश किए बगैर खत्म नहीं करूंगा। इत्मीनान रखिए... आपकी इज्जत का एहसास है मुझे। नौशाद साहब घबराहट और खुशी के मिले-जुले रंगो से मुस्करा दिए, और फिर से गाने की रिकार्डिंग जारी रखी गई। दो चार टेक्स और हुए और रंग इस क़दर फैला... समां इस हद तक बना कि... गाना खत्म होने का होश गंवा बैठे सुननेवाले। सहगल साहब ने नौशाद से पूछा-

“हुजूर...आपको मेरी गायकी से कोई शिकायत तो नहीं बाकी?” नौशाद साहब कहें तो क्या कहें? इस अज़ीम फ़नकार की, अज़ीम फ़ितरत तो, यूं ही नीलाम कर पाने की सलाहियत रखती थी..., वो क्या जवाब देते....। सहगल साहब ने कहा...

“बहुत उम्दा धुन है, और अच्छा लिखा हुआ नग़मा है... नौशाद मियां, यह नग़मा मेरी ज़िंदगी के सबसे बेहतरीन नग़मों में से एक है... बहुत खूब।”
 
सहगल साहब ने ठीक ही कहा था। ज़िंदगी का आखरी सफ़र करते वक्त, उन्होंने वही गीत अपने जनाज़े के साथ बजवाने की वसियत की थी। सहगल साहब पहले हिन्दुस्तानी फ़नकार थे, जिन्होंने अपने फ़न की मिसाल, आने वाली पीढ़ियों के लिए बतौर - सबूत महफूज़ रखी है। सहगल साहब से पहले फ़न को वह मक़ाम कभी हासिल नहीं हुआ था, गायकी को वो इज्ज़त इज़हार और इन्सान नहीं मिल पाए थे, जिसको सनम मानकर परस्तिश करना मुमकिन हो सका हो। अदाकारी चाहे अपने शुरूआती असर में थी, लेकिन गायकी यक़ीनन मंज़िलों की बुलंदी पर खड़ी थी, जिसे आफ़ताब मानकर हर आने वाले कलाकार ने सजदा किया।
 
सहगल - रतनबाई.   फ़िल्म यहूदी की लड़की


सहगल साहब ने ठीक ही कहा था। ज़िंदगी का आखरी सफ़र करते वक्त, उन्होंने वही गीत अपने जनाज़े के साथ बजवाने की वसियत की थी। सहगल साहब पहले हिन्दुस्तानी फ़नकार थे, जिन्होंने अपने फ़न की मिसाल, आने वाली पीढ़ियों के लिए बतौर - सबूत महफूज़ रखी है। सहगल साहब से पहले फ़न को वह मक़ाम कभी हासिल नहीं हुआ था, गायकी को वो इज्ज़त इज़हार और इन्सान नहीं मिल पाए थे, जिसको सनम मानकर परस्तिश करना मुमकिन हो सका हो। अदाकारी चाहे अपने शुरूआती असर में थी, लेकिन गायकी यक़ीनन मंज़िलों की बुलंदी पर खड़ी थी, जिसे आफ़ताब मानकर हर आने वाले कलाकार ने सजदा किया।

चंडीदास’ फ़िल्म से सफ़र के आखरी क़दम शाहजहां  तक जो फ़िल्में सहगल साहब को साथ लाई, वे सहगल, साहब की आवाज की बेमिसाली के सबूत हैं। उनकी अदाकारी, महज एक बहाना थी, जो उस वक्त के फ़िल्मी माहौल और तकाज़ों का नतीजा भर थी।

तानसेन - प्रेसिडेंट - दूश्मन - मेरी बहन - कुरुक्षेत्र - यहूदी की लड़की - भंवरा - देवदास - परवाना और लगन जैसी फ़िल्में फकत संगीत की बेहिसाब मंज़िलों के निशानात थे, गले का मिठास, लोच, इज़हार और आवाज़ की बारीकियों से लबरेज़, सहगल साहब की आवाज़ एक पातालगंगा का रूप था, जिसकी पाक़ीज़गी पर किसी को शुबह नहीं होता।

18 जनवरी 1947 के रोज़ सहगल साहब को, अश्कों के हार पहनकर, याद फ़र्माया जाता है। यूं तो रोज़ना, सुबह आठ बजे रेडिया सिलोन सहगल साहब का नग़मा बजाकर, हमें हमारे फ़र्ज से आगाह किया करता है। कोई न कोई नग़मा.... उनकी बेमिसाली का नया पन्ना लिख जाता है, और तब से आज तक उनके फ़न के न जाने कितने क़िस्से, तवारीख में लिखे जा चुके हैं, जो इन नग़मों के तरन्नुम से लरज़ते रहेंगे.....

सो जा राजकुमारी सो जा...
इक बंगला बने न्यारा...
रुमझुम रुमझुम चाल तिहारि...
ए दिले-बेक़रार झूम...
इक राजे का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा...
करुं क्या आस, निरास भई...
दीया जलाओ जगमग जगमग...
भोर सुहानी, चंचल बालक..
ग़म दिए मुस्तकिल...
दुख के अब दिन बीतत नाहीं...
नुक्ताचीं है ग़मे-दिल...
 
अमर सहगल में मुघेरी.   सहगल की भूमिका में.


अच्छे गायक के साथ साथ अच्छे इन्सान होने का गुण, सहगल साहब की शख्सियत का रौशन सितारा पहलू रहा। उनके मुताबिक वो गायक और मशहूर इन्सान बाद में है, पहले वो आम इन्सान है, जो बाकी इन्सानों की तरह, किसी का भाई, किसी का बाप और किसी का बेटा है। नए कलाकार को हौसला देना, उसकी हिम्मत बरक़रार रखने में मददगार होना, उनकी पसंद और शौक़ में शामिल रहा। हमेशा कलाकारों से बराबरी या हसद के एवज़, मुहब्बत और नियाज़ से पेश आना, उनकी इज्ज़त में शामिल रहा।

उनके फ़न की रहनुमाई और शार्गिदी तो कई लोगों ने की, लेकिन उनकी फ़ितरत का हिस्सा हर कोई नहीं बांट सका।

सी.एच. आत्मा, मुकेश, तलत महमूद, जगमोहन, हेमंतकुमार, मन्नाडे, किशोर कुमार उनके लुटाए हुए उजालों में सफ़र करने वाले राही साबित हुए। कौन भला उनके रंग से जुदा रह पाता? रफ़ी साहब ने, सहगल साहब को अपने संगीत का आदर्श माना, और लता मंगेशकर ने उन्हें अपना फिल्मी-गुरु कह, अपनी रहनुभाई की। सुरैया, अमीरबाई कर्नाटकी और खुर्शीद जैसी गायिकाओं ने, उन्हें अपना मनपसंद साथी कहकर, उनकी इज्ज़त को दोबाला किया है।

उनकी मकबूलियत का यह सबूत काफ़ी है कि उनकी मौत के बाद ’अमर गायक सहगल’ नाम की फ़िल्म बनाई गई जिसे 1955 में नीतिन बोस ने पेश किया। इस फ़िल्म का संगीत बोराल साहब, पंकज मलिक और तिमिर बॅरनने दिया था।
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This article is a reproduction of the original that appeared in Maazi Magazine, January, 1988 ( pp. 25-27).

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