indian cinema heritage foundation

Kahan lupt ho gayee..... कहां लुप्त हो गई फिल्म की वह शास्त्रीय धारा

04 Jun, 2021 | K K Talkies by Krishna Kumar Sharma
Baiju Bawra (1952). Image courtesy: Cinema Express

भारतीय शास्त्रीय संगीत को विभिन्न राग-रागनियों से समृद्ध करने और उसे लोकरंजन का माध्यम बनाने में स्वामी हरिदासतानसेन से लेकर उस्ताद अब्दुल करीम खां, उस्ताद अमीर खां, बड़े गुलाम अली खां, पं. विष्णु नारायण भातखंडे, पलुस्कर व पं. कृष्णराव, आदि संगीतचार्यों का जो योगदान रहा है वह तो स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है ही किन्तु उसे सुगम संगीत के रास्ते से जन-जन तक पहुंचाने में जो भूमिका हिन्दी सिनेमा ने निभाई है वह भी कम नहीं।

यों तो भारीतय सिनेमा के मूकयुग (1931-1970) में ही संगीत का प्रयोग आरम्भ हो चुका था किन्तु 1931 में ’आलमआरा’ के प्रदर्शन के साथ जैसे ही भारतीय सिनेमा ने ’सवाक युग’ में प्रवेश किया वैसे ही फिल्मों में गति संगीत की महत्वा भी बढ़ गई। खासकर 1936 में ’पाश्र्वगायन’ के प्रयोग से फिल्मों की लोकप्रियता में भी चार चांद लग गए। अब पर्दे पर रूप, आवाज और संगीत का अभूतपूर्व संगम था। पाश्र्वगायन के चलन के यदि आने वाले 35 वर्षों में (यानि 1970 के आसपास तक) हिन्दी फिल्मों ने ’शास्त्रीय रागों’ पर आधारित ऐसे हजारों मधुर सरल और सरल गीतों की सर्जना की जिनकी मिठास और अनुभूति की प्रखरता को युगों तक महसूस किया जाएगा।

इस युग के प्रमुख फिल्म संगीतकारों जैसे झण्डे खां, श्याम सुन्दर, सरस्वती देवी, आर.सी. बोराल, गुलाम हैदर, गुलाम मोहम्मद, खेमचन्द प्रकाश, अनिल विश्वास, हुसनलाल भगतराम, नौशाद, एस.डी. बर्मन, सी. रामचन्द्र, बसंत देसाई, एस.एन. त्रिपाठी, शंकर जयकिशन, मदनमोहन, हेमंत कुमार, रौशन, खैय्याम, ओ.पी. नैयर, रवि, सलिल चैधरीजयदेव आदि ने जिस प्रकार शास्त्रीय रागों के कहीं विशुद्ध प्रयोग से तो कहीं उनके स्पर्श मात्र से फिल्मी गीतों में मधुरता, प्रभावोत्पादकता और जीवंतता पैदा की वह स्वयं ही उनकी अद्भुत सामथ्र्य का परिचय है।
 



 
हिन्दी के जाने माने कवि जिस युग में शब्दों के आडम्बर और बौद्धिक अहंकार में डूबे हुए थे उस युग में प्रदीप, पं. भरत ब्यास, पं. नरेन्द्र शर्मा, गोपाल सिंह नैपाली, साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, मजरूह सुलतानपुरी, जां निसार अख्तर, शैलेनद्र, राजेन्द्र कृष्ण, इंदीवर, राजा मेंहदी अली खां, कैफी आजमी, नीरजगुलजार आदि गीतकारों ने सीधी सरल भाषा में ऐसे मधुर गीतों की रचना की जो देखते ही देखते हर किसी की जुबान पर चढ़ गए।

इसे हिन्दी सिनेमा का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि ऐसे महान फिल्म संगीतकारों व गीतकारों के युग में सहगल, पंकजमलिक, के.सी. डे, सी.एच. आत्मा, प्रदीप, दुर्रानी, सुरेन्द्र, चितलकर, रफी, तलत, मन्ना डे, मुकेश, हेमंत कुमार, बर्मन दा, किशोर और मेहेन्द्र कपूर, जैसे गायकों और नूरजहां, शमशाद बेगम, राजकुमारी, सुरैया, गीता दत्त, लता, आशा और सुमन कल्याण्पुर जैसी गायिकाओं का भी उदय हुआ।

1931 से 1970 के इस यादगार दौर में निर्मित कुल 4356 फिल्मों के लगभग 35000 गीतों में से कम से कम 3000 गीत ऐसे चुने जा सकते हैं जो न केवल शास्त्रीय दृष्टि से बल्कि शाब्दिक रचना व काव्यात्मक प्रभाव की दृष्टि से भी उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। इन फिल्मों में कुछ संगीत प्रधान फिल्में तो ऐसी थी जिनके मधुर शास्त्रीय गीतों ने आम आदमी को शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया। तानसेन, संगीत सम्राट  तानसेन, बैजू बावरा, शबाब, बसंत बहार, मेरी सूरत तेरी आंखें, नौ बहार, चोरी-चोरी, गूंज उठी शहनाई, भाभी की चूड़ियां, सीमा, ममताअनुराधा आदि फिल्में इस श्रेणी में रखी जा सकती है।
 


 
फिल्मी संगीतकारों ने शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों को जितनी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है उसके सौकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं- राग वेरागी पर आधारित ’नाचे मन मोरा मगन तिकदा धीगी धीगी’ (फिल्म मेरी सूरत तेरी आंखें), ’फुलगेंदवा न मारो, न मारो लगत करेजवा में चोट’ (दूज का चांद), ’लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे’ (दिल ही तो है), ’दिया न बुझे री आज हमारा’ (सन आफ इंडिया), ’जो तुम तोड़ो पिया मैं नाही तोड़ूं रे’ (झनक झनक पायल बाजे), आदि गीतों ने किसका हृदय अपनी ओर आकर्षित नहीं किया। ’राग पीलू’ पर आधारित ’रेते बिन सूने नैन हमारे’, ’राग यमन कल्याण पर निबद्ध ’मन रे तू काहे न धीर धरे’ (चित्रलेखा) व ’तुम गगन के चन्द्रमा हो मैं धरा की धूल हूं’ (सती सावित्री) जैसे खूबसूरत गीत और ’न तो कारवां की तलाश है’ (फिल्म बरसात की रात) जैसी शानदार कव्वाली किसके अधरों पर नहीं तैरी। बैजू बावरा का ’जो दुनिया के रखवाले’, ’मेरे हुजूर’ फिल्म का झनक झनक तोरी बोले पायलिया व रानी रूपमती का ’उड़ जा भंवर मायाकमल का आज बंधन तोड़ के’ जैसे सदाबहार गीत राग दरबारी (कान्हड़ा) के प्रयोग के उत्कृष्ट उदाहरण है।

फिल्म ’स्वर्ण सुन्दरी’ का मधुरतम गीत ’कुहु कुहु बोले कोयलिया’, मुगले आजम का ’प्रेम जोगन बन के’, संगीत सम्राट तानसेन का ’झूमती चल वहा’ जैसे उत्कृष्ट शास्त्रीय गीत राग सोनी के गर्भ से जन्मे। ’मन तड़पत अरि दर्शन को आज’ (फिल्म बैजू बावरा), राग मालकौंस पर ’छम छम नाचत आई बहार (छाया), राग बसंत पर, ’डर लागे गरजे बदरिया’ (रामराज्य) राग मेघ मल्हार पर ’ये री मैं तो प्रेम दिवानी’ (नौबहार) राम भीम पलासी पर ’जिया ले गयो री मीरा सांवरिया (अनपढ़), राग यमन पर ’हाय रे हाय वो दिन क्यों न आए’ (अनुराधा), राग कलावती पर ’पवन दीवानी न माने उड़ावे घुंघटा (डा. विद्या), राग बहार पर ’रसिक बलमा हाय दिल क्यूं लगाया तोसे (चोरी चोरी), राग भूप कल्यान पर मनमोहना बड़े झूठे (सीमा), राग जयवंती पर पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई (मेेरी सूरत तेरी आंखे) और मोहे भूल गए सावारिया (बैजू बावरा) राग वसंत पर ज्योति कलश छलके (भाभी की चूड़ियां) राग भूपाली तेरे नैना तलाश करें (तलाश), राग छायानट पर रूम रूम चाल तिहारी (तानसेन), राग संकटा पर सकल गगन मन पवन चलत पुरवाई (ममता), राग खमाजी बहार, आज गावत मन मेरो झूम के (बैजू बावरा), राग देवी पर और मधुवन में राधिका रे (कोहिनूर), राग हमीर पर आधारित है।

 

 
कभी कभी तो फिल्मी गीतों का रूप इतना सरल रहता है कि साधारण श्रोता इन गीतों का संबंध रागों से करता ही नहीं। उदाहरण के लिए राजा की आएगी बारात (आह), रमैया वस्ता वैया (श्री 420), गरीब जान के हमका न तुम भुला देना (छुमंतर), आदि गीत वैरवी राग की उपज हैं। इसी तरह जिन्दगी भर नहीं भूलेगी (बरसान की रात) राग यमन पर, ये कहानी है दिए और तूफान की (तूफान और दिया) राग मालकौंस पर, आ लौट के आजा मेरे मीत (रानी रूपमती), राग बिन्दवली सारंग पर, इक था बचपन इक था बचपन (आशीर्वाद) रोग तोड़ी पर, आंसू भरी है ये जीवन की राहें (परवरिश) राग यमन पर, तेरे सुर और मेरे गीत (गूंज उठी शहनाई) राग बिहार पर आधारित हैं।

फिल्मी संगीतकारों ने कुछ पुरानी बंदिशों को जिस तरह सरल रूप में पेश करके उन्हें अधिक लोकप्रिय बनाया वह निश्चय ही उनकी विलक्षण सर्जनात्मक शक्ति का प्रमाण है। उदाहरण के तौर पर पं. विष्णु नारायण भातखंडे की एक बंदिश गरजत बरसत भीजत आयो रे को गरजत बरसत सावन आयो रे के रूप में स्वामी हरिदास की रचना सप्त सुरन तीन ग्राम उनचास कोटि तान को फिल्म संगीत सम्राट तानसेन में और उस्ताद अब्दुल करीम खां की प्रसिद्ध ठुमरी कैरो आऊं यमूना के तीर को फिल्म देवता में खूबसूरत धुनों में पिरो कर उन्हें जन-जन तक पहुंचा दिया।
 

 
किन्तु दुख की बात है कि जिन फिल्म संगीतकारों ने भारतीय संगीत को भारतीय जनमानस के बीच पहुंचाने में इतना योगदान किया उनकी हमारे विशुद्ध शास्त्रीय संगीतचायों ने कभी निश्छल भाव से प्रशंसा नहीं की। बल्कि फिल्म संबीत को हेय दृष्टि से ही देखा। लेकिन दूसरी तरफ फिल्म संगीतकारों ने बड़े मनोभाव और आदरपूर्वक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों और वादकों को मुंहमांगी रकम दिलाकर समय-समय पर आमंत्रित किया। फिल्म मुगले आजम में नौशाद ने आदर सहित बड़े गुलाम अली खां को उस जमाने में 20,000 रुपये की मुंहमांगी रकम दिलाकर सिर्फ एक गीत ’प्रेम जोगन बन के’ गवाने के लिए आमंत्रित किया। फिल्म गूंज उठी शहनाई में प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां की शहनाई और मेरी सूरत तेरी आंखें के एक गीत नाचे मन मोरा मगन तिक दा धीगी धीगी में प्रसिद्ध तबला वादक पंडित सामता प्रसाद का तबला वादन तो आज भी संगीत प्रेमियों को याद होगा।
 

 
इसी प्रकार फिल्मी संगीतकारों ने सौकड़ों शास्त्रीय धुनें खासकर शास्त्रीय नृत्यों के साथ गाए जाने वाले गीतों में तराना का जैसी खूबसूरती से प्रयोग किया वह अपने आप में लाजवाब है। उदाहरण के तौर पर फिल्म दिल ही तो है में लागा चुनरी में दाग को मन्ना डे ने जिस खूबसूरती से गाया वह सिर्फ उन जैसे समर्थ गायक के बस की ही बात थी। खासकर इस गीत के आखिर में ना दिर दिर तोम तदानी का जो तराना उन्होंने पेश किया वह फिल्म संगीत को ऊचाइयों पर ले जाता है। फिल्म कोहिनूर के भी एक गीत मधुबन में राधिका नाचे रे में संगीतकार नौशाद ने तराने का बड़ा खूबसूरत इस्तेमाल किया। इस गीत के आखिरी मुखड़े में ’मृदंग बाजे तिरकिट धुम ताता, तधई तधई ता धोम धोम तन नन धोम धोम तननन क्डान धा क्उान धा’ को जिस तरह मुहम्मद रफी ने गयाया था वह किसे याद नहीं।

शास्त्रीय धुनों पर आधारित ऐसे सैकड़ों हजारों फिल्मी गीत हैं जिन्हें जितनी बार सुने उनकी मधुरता खत्म नहीं होती। किन्तु इधर पिछले दो दशकों से भारतीय फिल्म संगीत पर पाश्चात्य संगीत का जो प्रभाव बढ़ा है उससे फिल्म संगीत की वह मधुर धारा अवरुद्ध सी हो गई है।

अब समय आ गया है कि इस धारा को एक बार फिर प्रवाहित किया जाए। इसके लिए फिल्मकारों को पाश्चात्य संगीत का मोह त्याग कर एक बार शास्त्रीय और लोक धुनों पर आधारित पुराने संगीत को स्थापित करना होगा। जिस तरह आज टी.वी. पर पुरानी फिल्मों के गीतों पर आधारित अन्ताक्षरी, सरेगम और अन्य कार्यक्रम देखे सुने जाते हैं वे इस बात के प्रमाण हैं कि मधुर संगत के प्रति दर्शकों की रुची न कभी बदली थी न बदली है और न बदलेगी। पर इस सबके बावजूद धन के लोभ और सस्ती लोकप्रियता के मोहजाल में उलझकर यदि हमारे संगीतकार देश के करोड़ों फिल्म संगीत प्रेमियों को भारतीय संगीत से वंचित रेखते हैं तो इसे होने वाले दुष्परिणाम को सेहरा उनके सर पर ही होगा।

 

  • Share
58 views